बिहारी विवेक को भटकने ना दो -
" हमारा प्रतिभा चमक रहा हैं
चाहे वो विदेश हो या स्वदेश,
पर विवेक हमारा भटक रहा हैं
हर देश और प्रदेश "
बिहार की राजनीति में विश्व भर की नजर गङी रहती हैं, क्योंकि यहां के युवा हर जगह मिलेंगे चाहे दुबई हो या दक्षिण अफ्रीका, खैर देश - प्रदेश की बात ही छोड़िये और राजनीति का खेल देखना कौन नहीं चाहेंगा क्योंकि भईया राजनीति के बिना लोकतंत्र और वोट के बिना नेतागिरी का कोई मतलब ही नहीं है . लोकतंत्र के राज्य में विकास का बल्ब जलाना है तो नेताओं को तो जीतना ही पङेगा . विकास कार्यों में नेताओं की सर्वोपरि भूमिका होती हैं तभी तो लोगों ने नीतीश कुमार को विगत तीसरी बार अपना मुख्यमंत्री चूना हैं लेकिन सीटों के आधार पर बात करे तो यह लालू प्रसाद यादव की जीत है,लेकिन वोट तो बीजेपी व जदयू शासन काल को देखकर ही कुमार को मिला हैं. राजनीति का गढ माना जाने वाला बिहार के पास इतिहास काल से ही राजेंद्र प्रसाद, कर्पूरी ठाकुर और अन्य राष्ट्रीय स्तर के नेता रहे हैं और अगर आज के समय की बात करें तो हमारे यहां नेताओं व राजनीतिक दलों की भरमार हैं. बिहार के प्रतिनिधियों के आगे किसी की भी दाल नहीं गलती हैं और यहां की प्रतिभा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोहा मनवा चूँकि हैं क्योंकि यह वही धरती है जहां पर बुध्द को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी .विश्व का पहला विश्वविद्यालय नालंदा विश्वविद्यालय तो हमने बनाया लेकिन हम आज तक शिक्षा के क्षेत्र में विकास नहीं कर पाए, आज भी हमारी स्थिति उपहास का उदाहरण बनती हैं और बढती बेरोजगारी पलायन का. सार्वभौमिक सच तो यह भी है कि हम अपने प्रतिभाशाली युवा वर्ग के पलायन को अभी तक रोक नहीं पाए हैं. ट्रेन व बसों की भीड़ को देखते ही लोग एकाएक बोल पङते है कि, यह सब बिहारी बाबू हैं और धरती के हर जगह पर नेटवर्क या यातायात सुविधा मिलने में कठिनाई होगी लेकिन भईया लोग आसानी से और किफायती मूल्य में मिल ही जाएंगे. मुझे वो दिन आज भी याद हैं जब मेरे एक ओङिसा के दोस्त ने मुझसे पूछा था कि रवि क्या तुम्हारे यहां अच्छे कालेज नहीं हैं जो कि तुम अपने घर से दूर आए हो तो मेरे पास कोई पुख्ता जवाब नहीं था तो मैंने चुप रहने में ही भलाई समझी क्योंकि मुझे वो दिन भी याद हैं, जब बिहारियों को खदेङा जा रहा था और किसी बिहारी पत्रकार के द्वारा यह न्यूज दिखाया भी जा रहा था, हाँ यह बात अलग है कि हम एकता व अखण्डता के बारे में पढ कर भाषण देते हैं क्योंकि बोलने की तो आजादी हैं और नेताजी मुझे वो दिन भी याद हैं जब मैं एक कारखाने में अध्ययन कार्य से घूमने गया था, तो वहां मुझे विवेक नाम का एक लङका मिला जो कि सीतामढ़ी से था, वो वहाँ 250रू. पर मजदूरी कर रहा था लेकिन दुख तो तब हुआ जब मैंने उसके मार्क शीट देखे, बिचारे ने प्रथम श्रेणी से परीक्षा पास की थी पर अफसोस की वो गरीबी के कारण आगे पढ़ा नहीं, उसने कोशिश की थी सरकारी मदद से पढने की लेकिन जो बातें उसने कल्याण व शिक्षा विभाग की बताई तो भ्रष्टाचार का नया अध्याय पढने को मिला लेकिन जब वह बोला कि भईया आप को चांस मिला हैं, आप बिहार का नाम रोशन किजिए तो उसके प्रेम को देखकर सोंचा की काश इस भावना व ललक को हमारे नेता व अधिकारी समझ जाते तो आज हमारा विवेक भी बिहार में ही रहता. अपने सपने को पूरा करने के लिए वह दर - दर की दुत्कार तो नहीं सहता और सच में सारे विवेक दिल से कहते की "हमें गर्व हैं कि हम बिहारी हैं" चाहे यह नारा बीजेपी का होता या फिर राजद का. अब जिन्दा रहने के लिए जिन्दाबाद, जिन्दाबाद....... तो बोलना ही पङता हैं.